रतलाम की इस सड़क पर विकास या विनाश का पैचवर्क?
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रतलाम | D I T NEWS
रतलाम के जावरा फाटक से सेजावता फंटा तक बन रहे फोरलेन की हालत देखकर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या 'विकास' की परिभाषा केवल कागजों और बजट की बंदरबांट तक सीमित रह गई है? ₹17 करोड़ की भारी-भरकम राशि जनता के पसीने की कमाई है, जिसे 'एपोक्सी' के लेप से ढंकने की कोशिश की जा रही है।

हैरानी की बात यह है कि जिस सड़क को भारी वाहनों का दबाव झेलना है, वह उद्घाटन से पहले ही उखड़ने लगी है। लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारी इसे तकनीकी खामी बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और मॉनिटरिंग के अभाव का मामला है। जब 16 महीने की देरी के बाद भी काम अधूरा है और नालियां टूटी हुई हैं, तब ठेकेदार पर केवल 'पेनल्टी' की धमकी देना खानापूर्ति के अलावा और कुछ नहीं लगता।

अगर आज इस घटिया निर्माण पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले मानसून में यह फोरलेन केवल हादसों का केंद्र बनकर रह जाएगा। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की 27 शिकायतों को नजरअंदाज करना प्रशासन की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। अब समय है कि 'ब्लैक लिस्ट' और 'रिकवरी' जैसे कड़े शब्दों को अमल में लाया जाए, वरना यह 'पैचवर्क' जनता के विश्वास पर भी एक गहरा जख्म होगा।
देखिए जनता ने क्या कहा?
सड़क की दुर्दशा पर क्षेत्र के लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। स्थानीय नागरिकों की राय....
(स्थानीय व्यवसायी): "सड़क के बीचों-बीच मुरम के ढेर और लटकते बिजली के तारों ने हमारा व्यापार और चलना-फिरना दूभर कर दिया है। रात के समय यहाँ से गुजरना किसी जोखिम से कम नहीं है।"
(रहवासी): "हम टैक्स देते हैं ताकि हमें अच्छी सुविधाएं मिलें, न कि टूटी हुई नालियां और उखड़ी हुई सड़कें। क्या प्रशासन तब जागेगा जब कोई बड़ा हादसा हो जाएगा?
(रहवासी): "तकनीकी अधिकारी कह रहे हैं कि एपोक्सी सीसी से मजबूत है। अगर ऐसा है तो पूरी सड़क ही इससे क्यों नहीं बनाई? यह सिर्फ घटिया सामग्री को छिपाने का तरीका है।"
इसका जिम्मेदार कौन?
(1) क्या PWD के बड़े अधिकारियों ने मौके पर जाकर निर्माण सामग्री की टेस्टिंग की?
(2) 27 शिकायतों के बाद भी ठेकेदार का भुगतान और काम जारी रहना किस सांठगांठ की ओर इशारा करता है?
(3) बार-बार उखड़ रही सड़क क्या भविष्य में भारी यातायात का दबाव सह पाएगी?